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अध्यक्ष की लड़ाई में चित अहमद को प्रदेश इकाइयों में वफादारों का सहारा

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लोकसभा चुनाव की हार की जिम्मेदारी लेते हुए राहुल गांधी ने कांग्रेस कार्यसमिति में अपने इस्तीफे के बाद प्रदेश अध्यक्ष और प्रभारी महासचिव पर भी इस्तीफा देने का दवाब बनाया था। उनकी कवायद संगठन को चुस्त-दुरस्त बनाकर मोदी सरकार की दूसरी पारी में सशक्त विपक्ष बनने की थी। मगर अहमद पटेल ने उनके इस प्लान पर ही पलीता लगा दिया। उनके सुझाए व नामित प्रदेश अध्यक्ष व प्रभारी महासचिव राहुल को ही शो ब्वाय और अहमद को अपना राजनीतिक आलाकमान माना और इस्तीफा देने से बचते रहे।

उसके बाद कांग्रेस कार्यसमिति के वरिष्ठ सदस्यों के सुझाव को मानते हुए राहुल कार्यकारी अध्यक्ष बनाने पर तैयार भी दिखे। इसी दौरान सुशील कुमार शिंदे का नाम सामने उभर कर आया था। वहीं से अहमद खुलकर शिंदे के विरोध में आ गए और राहुल गांधी की राह में रोड़ा अटकाने के साथ चुनौती देनी शुरू कर दी। अध्यक्ष पद के लिए अपने चंपुओं में से किसी को अध्यक्ष बनाने की कवायद में शह-मात की लंबी पारी में आखिरकार कांग्रेस के सर्वेसर्वा बने अहमद सोनिया-राहुल की सियासी चाल से मात खा ही गए।

पूर्व प्रधानमंत्री और दिवंगत पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष भारत रत्न राजीव गांधी की 75वीं वर्षगांठ पर आयोजित कार्यक्रम में पंचायत, शहर, जिला, ब्लॉक और प्रदेश के नेताओं का जमावड़ा रहा, मगर बाबा बने घूम रहे अहमद पटेल और उनके साथियों को भारी शिकस्त का सामना करना पड़ा है। न तो मंच पर ये नेता दिखे न ही पोडियम पर किसी को बोलने का मौका मिला। यही वजह है कि अहमद अब प्रदेश इकाइयों में अपने वफादारों के माध्यम से कांग्रेस अध्यक्ष से टकराने का मन बना चुके हैं। इसी कड़ी में उन्होंने पहली किश्त में हरियाणा के भूपेंद्र सिंह हुड्डा को आगे कर कांग्रेस अध्यक्ष को झटका देने की एक कोशिश की।

अलग-थलग पड़ चुके गुलाब नबी आजाद की सहमति और अहमद पटेल की शह पर भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने कांग्रेसी आलाकमान और गांधी परिवार को धता बताते हुए परिवर्तन रैली की थी।  रैली में गांधी परिवार के किसी नेता को पोस्टरों और बैनरों में जगह न देकर उनके नेतृत्व को ही नकार दिया था। हुड्डा ने अपनी परिवर्तन रैली में कांग्रेस आलाकमान की खुली आलोचना भी की थी और अपने नेतृत्व में कमिटी गठित करने का ऐलान भी किया था। इसकी घोषणा 19 अगस्त को ही होनी थी। कांग्रेस में अपनी राजनीतिक संभावनाओं को तलाशने वाले दीपेंद्र हुड्डा का मशविरा मानते हुए इसके ऐलान को ऐन वक्त पर रोक लिया गया।

22 अगस्त को राजीव गांधी की स्मृति में आयोजित सभा में युवाओं के नाम पर पूर्व सांसद दीपेंद्र हुड्डा को युवाओं के नाम पर भी कुछ करने और बोलने का मौका नहीं मिला। बड़े हुड्डा उस सभा में गए ही नहीं। अहमद और आजाद को जिस तरीके से टीम राहुल ने इनके पिछले कारनामों का हिसाब करते हुए नफे-नुकसान का आकलन करने के साथ इनको किनारे पर ला खड़ा किया है। अब ये दोनों घाघ नेता अपने-अपने तरीके से अपनी सियासी धमक दिखाने की जुगत बिठा रहे हैं। इसी कड़ी में गुलाम नबी आजाद और अहमद पटेल की जोड़ी अपनी सियासी वजूद को बचाने के लिए साथ-साथ हो लिए हैं।  ऐसी चर्चाएं जोरों पर हैं कि जब राहुल के कश्मीर दौरे के एक दिन पहले आजाद के घर देर शाम अहमद, दीपेंद्र के साथ भूपेंद्र हुड्डा पहुंचे थे।

यहीं से तय रणनीति के साथ हुड्डा ने हरियाणा में 10 विधायकों के नाम जोड़ते हुए 38 सदस्यीय कमिटी की घोषणा कर दी। इस कमेटी में चेयरमैन पूर्व मंत्री हर मोहिंदर सिंह चट्ठा और संयोजक विधायक उदय भान को बनाया गया है। इन तमाम तिकड़मों के बीच चुनाव तक अशोक तंवर का बना रहना पक्का माना जा रहा है। इससे पहले कुमारी शैलजा का प्रदेश अध्यक्ष बनना तय माना जा रहा था। मगर खुद को राष्ट्रीय अध्यक्ष की दौड़ में लाकर उन्होंने अपनी काट खुद खोज ली। अलबत्ता तंवर के साथ तीन कार्यकारी अध्यक्ष बनाए जाने की बात भी हो रही है जिसमें जातिगत समीकरणों को साधने का प्रयास किया जाएगा।

हरियाणा के बाद बिहार से अगली चुनौती कांग्रेसी आलाकमान को मिलने जा रही है। बिहार में अहमद ने अपने गैंग को फिर से सक्रिय किया है। मदन मोहन झा की पीठ ठोक रहे अहमद के इशारे पर उन्होंने सोमवार को सलाहकार समिति की एक बैठक बुलाई है। बिहार का प्रभार छोड़ चुके अहमद के पुराने वफादार शक्ति सिंह गोहिल फिर से जड़ें जमाने की कोशिशों में जुटेंगे। खुद को राजपूत बताने वाले गोहिल वहां राजपूतों से ही शिकस्त खा चुके हैं। टिकट बेचने के आरोप में इस बिरादारी के नेताओं व कार्यकर्ताओं ने सदाकत आश्रम में ही इनकी पिटाई की थी। उन्होंने तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष को दिए गए इस्तीफे में अपनी ठुकाई-पिटाई का जिक्र किया था, जो पत्र सार्वजनिक है।

अहमद की शह पर ही बिहार में दूसरे दलों के नेताओं को तरजीह दी गई और दागी नेताओं को टिकट दिया गया था। इसमें पार्टी की जबर्दस्त फजीहत हुई। सूबे के पीसीसी और प्रभारी जिस बाहुबली को पटना की रैली में लाखों की भीड़ जुटाने का इंतजामिया बता रहे थे, उसकी गिरफ्तारी के विरोध में 1 दर्जन समर्थक उतर नहीं सके। अलबत्ता पीसीसी के बाद सीएलपी लीडर सदानंद सिंह और एमएलसी प्रेमचंद मिश्रा इस बाहुबली के बचाव में बयानबाजी कर रहे हैं। इससे पहले मदन मोहन झा अनंत के बचाव में बयानबाजी कर अपने ही कार्यकर्ताओं की निशाने पर हैं। पुलिसिया कार्यवाही के बाद अनंत सिंह की पत्नी व कांग्रेसी उम्मीदवार रह चुकी नीलम देवी की पूरी मदद करने का भरोसा जता चुके हैं। इसका खुलासा खुद नीलम देवी ने अपने समर्थकों के बीच किया।

पहले सरेंडर द्वारका कोर्ट में होना था लेकिन बिहार पुलिस की खुफिया तैनाती की वजह से ऐन मौके पर मामला साकेत कोर्ट की तरफ घूम गया। अनंत की मदद करने वाले इस कांग्रेसी नेता का मकान उसी द्वारका इलाके में हैं। बिहार के कांग्रेसी कार्यकर्ताओं की माने तो चुनावों में पार्टी फंड की बंदरबांट का बंटवारा भी प्रभारी और प्रदेश अध्यक्ष की देखरेख में हुआ। प्रदेश अध्यक्ष के परिवार का अपना कारोबार भी टैक्सी का है जो लोकसभा चुनाव में चल निकला। प्रदेश अध्यक्ष रहते हुए वे संगठन में भले कोई छाप न छोड़ पाए हों, मगर सुनियोजित तरीके से अपना कारोबार जरूर फैला लिया। सदाकत आश्रम के सूत्र बताते हैं कि कुछ कार्यकारी अध्यक्ष, पूर्व अध्यक्ष समेत कई नेताओं को 20-20 लाख से अधिक रकम दागी नेताओं को टिकट देने पर चुप रहने के लिए अदा की गई थी।

कांग्रेस के दागी नेता और भर्ती घोटाले में चार्जशीट हो चुके सीएलपी लीडर सदानंद सिंह कभी भी जेल जा सकते हैं। वे भी अनंत का बचाव कर रहे हैं। 5 बार चुनावों में जमानत जब्त करा चुके, 5 से अधिक बार पार्टी से निकाले गए एमएलसी बने प्रेमचंद मिश्रा भी बाहुबली अनंत सिंह की बेगुनाही के सबूत ढूंढते हुए बयानबाजी कर रहे हैं। इस पलटीमार नेता ने लालू के खिलाफ चारा घोटाले मामले को दर्ज कराया था और फिल्मकार प्रकाश झा से वसूली और राजद सुप्रीमो के साथ केस वापस लेने के नाम पर राजद की संस्तुति पर एमएलसी बन चुके हैं। पिछले दिनों परिवार समेत दिल्ली में मुकुल वासनिक को अध्यक्ष बनाए जाने के लिए पूरी कैंपेन छेड़े हुए थे।

अंडबंड टिकट वितरण के खेल में पैसे और शोहरत कमा चुके प्रदेश अध्यक्ष एआईसीसी कोषाध्यक्ष और पूर्व प्रभारी की शह पर आगामी विधानसभा में टिकट बेचो खेल को दोबारा खेलना चाहते हैं। अब तक पार्टी से बगावत कर चुके दूसरे दल से चुनाव लड़ चुके सांसद पुत्र को पार्टी से निष्कासन की बात छोड़िए, अब तक कारण बताओ नोटिस तक नहीं दे सके। ये सांसद महोदय भी उसी कारोबारी टीम का हिस्सा रहे हैं। सोमवार की इस मीटिंग में झा जी की सलाहकार मंडली क्या नए फैसले लेती है, इस पर बिहार के नेताओं और कांग्रेसी कार्यकर्ताओं की नजरें टिकी हुई हैं।

पश्चिम बंगाल को अहमद गैंग पूरी तरह से निबटा चुका है। इस पर अंतिम मोहर अंतरिम अध्यक्ष को भी लगानी पड़ी, क्योंकि वहां चुनाव होने हैं। वहां टिकटों का बंटवारा भी अहमद की शह पर सोमेन मित्रा पहले ही कर चुके हैं। वहां फिर से वामदलों के साथ जुगलबंदी देखने को मिलेगी। ये अहमद का ही खेल था कि महाराष्ट्र की टिकट वितरण कमिटी में नाबालिग आदिवासी और अल्पसंख्यक महिलाओं के बलात्कार के मुख्य आरोपी जेल से जमानत पर छूटे सुभाष धोते को शामिल किया गया है। अहमद की शह पर खड़गे ने शिवसेना से आए वरिष्ठता के क्रम में निचले पायदान पर छात्रवृति और खेल प्रतिभा के लिए आवंटित पैसों का गबन करने का गुनाह भी स्वीकार करने वाले व आरोपित विजय वडेतीवार को कांग्रेस विधायक दल का नेता बना दिया।

मध्य प्रदेश में भी कांग्रेस के समीकरण को अहमद अपने हाथ में रखना चाहते हैं। अहमद के गुजराती पारिवारिक मित्र के दामाद बाला बच्चन को पहले तो कमलनाथ सरकार में गृहमंत्री बनवा दिया और अब उन्हें प्रदेश अध्यक्ष जैसी महत्वपूर्ण भूमिका दिलवाना चाहते हैं ताकि कांग्रेस उनकी जेब में रहे। मध्यप्रदेश इकाई में अध्यक्ष की दौड़ में उनसे ज्यादा अनुभवी लोगों में राज्यसभा सांसद राजमणि पटेल, मोहन ढकुनिया भी मजबूत दावेदारी पेश कर रहे हैं। ये दोनों ओबीसी समुदाय का प्रतिनिधित्व करते हैं जिसकी सूबे में अच्छी-खासी तादाद है। झारखंड में भी अहमद ने अपने सिपाहसलार सुबोधकांत सहाय की अगुवाई में बगावत छेड़ी हुई है। इस वजह से आज तक प्रदेश अध्यक्ष तय नहीं हो पाया। इन तमाम अटकलों के बीच प्रदीप बालमुचु या रामेश्वर उरांव के हाथ बाजी लग सकती है, ऐसे संकेत मिल रहे हैं।

शीला दीक्षित के निधन के बाद दिल्ली में भी कांग्रेस में अध्यक्ष तय करने की कवायद जोरों पर चल रही है। यहां वर्षों से अहमद के चहेते पीसी चाको का राज चल रहा है। पूर्व मुख्यमंत्री शीला की मृत्यु के कुछ घंटे पहले सार्वजनिक चिट्ठी के बाद उनका खेल खुल चुका है। चाको को भी चलता किया जाएगा, इसका इशारा उन्हें दिया जा चुका है। अध्यक्ष पद की दौड़ में जिन नामों पर विचार चल रहा है उनमें पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष जयप्रकाश अग्रवाल, पूर्व सांसद महाबल मिश्रा, पूर्व एनएसयूआई अध्यक्ष रोमेश सब्बरवाल के नामों की चर्चा ने जोर पकड़ लिया है। सोनिया गांधी के अंतरिम अध्यक्षीय पारी में अहमद कितनी उड़ान भरते हैं, या फिर लहुलहान परिंदा बनकर किसी डाल पर लटक कर रह जाएंगे, इस पर सभी की निगाहें जमीं हैं।

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