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आरिफ को गवर्नर बनने के पीछे भाजपाई सियासत

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नई दिल्ली। पूर्व केंद्रीय मंत्री आरिफ मोहम्मद खां को केरल का महामहिम बनाए जाने के पीछे का सियासती खेल अब खुलता नजर आ रहा है। भाजपा की नजर उदारवादी और कट्टरवाद से इतर सेकुलर नेताओं को साधने की है। इसी कड़ी में 2019 की शुरूआत में भारतीय मुस्लिम राजनीति का मरकज बना दिल्ली स्थित इंडिया इस्लामिक कल्चरल सेंटर के चुनावों में भाजपा ने अपना दबदबा बनाने के लिए पूर्व केंद्रीय मंत्री आरिफ मोहम्मद खान पर दांव लगाया था।

संघ से जुड़ी सियासत भाजपा के उच्चस्थ सूत्रों ने ब्लिट्ज के साथ विशेष बातचीत में इस बात की पुष्टि भी की। भारत की मुस्लिम राजनीति में कट्टरवाद को अलग-थलग करने की भाजपाई कोशिश कामयाब होती दिख रही है। भाजपा का थिंक टैंक इस बात से सहमत है कि पाकिस्तान बनने के बाद भी मुस्लिम समाज का एक बड़ा तबका हिन्दुस्तान में ही अपना वतन मानते हुए रूका रहा जिसे टू नेशन थ्योरी को सिरे से नकार दिया था।

भाजपा के उच्चस्थ सूत्रों ने स्वीकार किया कि कांग्रेस ने तुष्टिकरण और भयभीत कर इन देशभक्त मुसलमानों को देश के अन्य दलों के सामने उन पर सवालिया निशान खड़े करने का सिलसिला शुरू किया। ये ठीक है कि 47 के बाद पाकिस्तान से हिजरत कर हिन्दुस्तान पहुंचे हिन्दुओं की मदद में संघ ने महती भूमिका निभाई। यही वजह थी कि हिन्दुओं की एक बड़ी जमात में संघ अपनी घुसपैठ करने में कामयाब रहा।

संघ की सदस्यता में इन शरणार्थियों की संख्या बढ़ती चली गई। ये लोग वहां के मुस्लिमों के अत्याचारों को यहां पर आज तक प्रचारित करते रहे हैं जिस वजह से एक बड़ा तबका मुसलमानों को भी पलायन करने की बात करता है। संघ की राजनीतिक शाखा भाजपा अब एक बड़े दल के रूप में देश पर काबिज है। अब भाजपा उन सेकुलर मुसलमानों के बीच जगह बना रही है जिसके लिए वह हर उस इदारे में अपना दखल और दबदबा बनाने के लिए ऐसे नेताओं की तलाश कर रही है जिन्हें देशभक्त और प्रगतिशील विचारों का प्रतिनिधि माना जाता है।

भाजपा की नजर आरिफ मोहम्मद खान पर बनी हुई थी। आरिफ मोहम्मद मुस्लिम समाज की कुरीतियों के खिलाफ खुलकर सामने आने वाले पहली पंक्तियों के नेता बने। उन्होंने शाहबानो मामले में जिस तरीके से अपने समुदाय को कटघरे में खड़ा किया था, भाजपा उसी लाइन पर आगे बढ़ते हुए तीन तलाक की कुरीतियों को कानून बनाकर उनके जैसे उदारवादी नेता के जरिए मुस्लिम समाज में पैठ जमाना चाहती है।

इसी को देखते हुए भाजपा ने इंडिया इस्लामिक सेंटर के चुनाव मैदान में उन्हें उतारा था। भाजपा कट्टरवाद को शिकस्त देते हुए वर्षों से जमे शिराज कुरैशी की चौकड़ी को हटाकर एक नई टीम देने की जुगाड़ में थी। भाजपा की कोशिश लगातार 15 वर्षों से बतौर अध्यक्ष कार्यभार संभाल रहे मीट व्यापारी सिराजुद्दीन कुरैशी चुनाव में शिकस्त देकर बाहर करना था। आपको बता दें कि इस आईआईसीसी के लिए जमीन दिवंगत प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने दिया था।

संघ के सूत्रों की माने तो पहले कोशिश कुरैशी को चुनावी मैदान से हटाने के लिए राजी करने के लिए की गई। इसके लिए एक शीर्ष सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी, जो आईआईसीसी के सदस्य भी हैं, उन्होंने उनसे संपर्क साधा था। पूर्व आईपीएस अधिकारी को कुरैशी को यह बताने के लिए राजी किया गया था अगर वे इस चुनाव से हट जाते हैं तो उन्हें मोदी सरकार द्वारा “सम्मानपूर्वक समायोजित“ किया जाएगा।

भारत के इस प्रतिष्ठित मुस्लिम क्लब की चुनावी दौड़ से अगर कुरैशी पीछे हट जाते तो इसका सीधा अर्थ था कि संघ इसमें घुसपैठ जमाने में सफल रहती और आरिफ मोहम्मद खान निर्विरोध आईआईसीसी के अध्यक्ष के तौर चुन लिए जाते। सूत्र बताते हैं कि सीधे तौर पर इस गैर-मुस्लिम सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी ने विनम्रतापूर्वक भाजपा के उस शीर्षस्थ नेता को यह दलील देते हुए मना कर दिया कि कुरैशी उनके प्रिय मित्र हैं और उनमें उन्हें चुनावी मैदान से हटने के लिए कहने की हिम्मत नहीं है।

दूसरा कि अब बहुत देर हो चुकी है। आपको बता दें कि इंडिया इस्लामिक इंटरनेशनल सेंटर में बड़ी संख्या में गैर-मुस्लिम सदस्य भी हैं। मीट निर्यातक, कुरैशी, जिनके सभी राजनीतिक दलों में मित्र हैं, उनके एकमात्र प्रतिद्वंद्वी के तौर पर अनुभवी राजनेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री आरिफ मोहम्मद खान थे।कुरैशी ने आरिफ मोहम्मद को एक बड़े अंतर से हराया। भले ही भाजपा आईआईसीसी चुनावों में घुसपैठ नहीं कर सकी, मगर बतौर इनाम आरिफ मोहम्मद खान को केरल का राज्यपाल बनाकर मुस्लिम समाज में एक बड़ा संदेश देने का काम अंजाम दिया है।

आरिफ मोहम्मद खान कांग्रेस और भाजपा सहित विभिन्न राजनीतिक दलों में लगभग सभी मलाईदार पदों पर रहे। आईआईसीसी के चुनाव की घोषणा के दौरान तक आरिफ मोहम्मद खुद को किसी भी राजनीतिक दल से जुड़ा नहीं बता रहे थे। आरिफ चुनाव के लिए कुछ दिन पूर्व तक उम्मीदवार नहीं थे। हर कोई आश्चर्यचकित था जब आरिफ आईआईसीसी में अध्यक्ष पद की की दौड़ में कूद पड़े। तीन बार के आईआईसीसी अध्यक्ष सिराजुद्दीन कुरैशी ने एक बार इस इदारे में भी अपनी हनक दिखा दी।

चुनाव की तैयारी अगर आरिफ दो महीने भी पहले भी तय कर लेते तो उनके लिए जीत मुमकिन थी, लेकिन आखिरी दौर में अचानक उम्मीदवार बनने से उनके अपने लोग भी उनकी मदद नहीं कर सके। आरिफ मोहम्मद खान काफी समय से राजनीतिक पार्टियों से दूरी बनाए हुए थे। एक साल से अधिक समय में उनके व्यवहार ने ऐसा कभी नहीं लगा कि सेकुलर सोच रखने वाले ये नेता भाजपा के साथ जा सकते हैं।

पेशे से एक वकील रहे आरिफ मोहम्मद ने मोदी सरकार द्वारा लाए गए ट्रिपल तालक कानून के पक्ष में सुप्रीम कोर्ट में अपनी दलीलें पेश की थी। लोकसभा में भी बहस के दौरान, भाजपाई सांसदों ने भी आरिफ खान की ट्रिपल तालक पर उनके अच्छे स्टैंड के लिए प्रशंसा की। आरिफ खान के केरल का राज्यपाल बनने से ये साफ हो गया कि आरिफ भाजपा के करीब थे।

भाजपा के साथ सदन में सुर मिलाने का मामला उनका सोची-समझी रणनीति थी। आपको याद दिला दें कि 18 अगस्त को दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब में भाजपा के थिंक टैंक श्यामा प्रसाद मुकर्जी फ़ाउंडेशन के सौजन्य से आयोजित तीन तलाक व्याख्यानमाला में पार्टी अध्यक्ष और गृहमंत्री अमित शाह ने चर्चा की शुरुआत में ही आरिफ़ मोहम्मद खान के तरीफों के पूल बांध दिए।

शाह ने कहा था कि आरिफ़ मुहम्मद खां बधाई के पात्र हैं जो मुस्लिम समाज से आने के बाद भी तीन तलाक़ के खिलाफ रहे। एक उदारवादी और प्रगतिशील नेता राजीव गांधी के नेतृत्व कांग्रेसी सरकार के मंत्री होने के बावजूद भी सरकार के खिलाफ मुखर होकर बोलता रहा। तीन तलाक पर आरिफ के बयान को भाजपा ने अपने राजनीतिक फायदे के लिए इस्तेमाल किया। क़ुरान एंड कंटेम्परेरी चैलेंजेज नामक पुस्तक के जरिए प्रसिद्धि पा चुके आरिफ  के बयानों के जरिए भाजपा नेताओं ने ये जताने की हमेशा कोशिश की कि तीन तलाक का क़ानून मुस्लिमों के खिलाफ नहीं, बल्कि मुस्लिमों के हित में है।

आईआईसी की हार मोदी सरकार में आरिफ खान और उनके शुभचिंतकों के लिए एक बड़ा झटका थी। इसलिए काफी सोच-विचार के बाद मोदी सरकार ने आरिफ खान को केरल का राज्यपाल चुना जहां कांग्रेस और मुस्लिम लीग का पैक्ट होता रहा है। आरिफ बतौर गवर्नर अपने रसूख से इस मुस्लिम लीग को तोड़ने की हैसियत रखते हैं। ये मोदी सरकार को केरल में जनाधार तलाश रही भाजपा को भी सूट करता है।

भाजपा का केरल की राजनीति में दबदबा बनाने का एक बड़ा सियासी दांव है। कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी वायनाड से लोकसभा सांसद हैं जहां मुस्लिमों की अच्छी-खासी आबादी है। उत्तर भारत में भी मुस्लिम समुदाय का एक बड़ा तबका आरिफ मोहम्मद खान का हिमायती रहा है जो सामाजिक कुरीतियों और कट्टरवाद के खिलाफ मुखर होकर बोलता है।

वहीं कट्टरवादी उन्हें सियासती मौकापरस्त कहते हैं क्योकि उन्होंने कांग्रेस के बाद कई दलों से अपने को जोड़ते-घटाते रहे हैं। अतीत में कुछ समय तक तो वे भाजपा में भी सक्रिय थे। आरिफ मोहम्मद खान बिना तैयारी के ऐन वक्त पर चुनाव में उतरे थे और बड़े अंतर से मात खाकर अपनी सियासती बाजी में जीतने में कामयाब रहे। राजनीति के अपने आखिरी दौर में गवर्नरी पकड़ने में कामयाब रहे।

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