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तेजस्वी के रिमोट से चलते गोहिल-राठौड़-मदन, प्रदेश के बड़े नेताओं को सिरे से नकारा

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बिहार में पांचों विधानसभा सीट और 1 लोकसभा सीट पर होने वाला उपचुनाव में कांग्रेस अब फिर से गठबंधन में ही लड़ेगी, ये अब साफ हो चुका है। हमने अपने पाठकों को अपने पिछले लेखों में इनका खेल खोल दिया था, जिस खेल की पटकथा पहले ही लिखी जा चुकी थी। 9 सितंबर को शक्ति सिंह गोहिल जब बिहार में मीटिंग ले रहे थे, तब बिहार के सभी नेताओं ने इनसे दूरी बना ली थी। बिहार की राजनीति में नौसिखिए साबित हुए गोहिल की छवि एक धंधेबाज नेता के रूप में अपनी चमक आज बनाए हुए हैं। इन उपचुनावों में इसी छवि को भुनाने से बाज नहीं आए।

लोकसभा के चुनाव नतीजों के बाद तीन महीने तक इस्तीफा देने की नौटंकी करने वाले, बिहार छोड़ भागने वाले ये प्रभारी थूक कर चाटने वाली कहावत को चरितार्थ करने फिर से सूबे में पहुंच गए हैं। उन्होंने पटना पहुंचने से पहले ही दिल्ली से ऐलान कर दिया था कि हम केवल दो सीटों पर समझौता नहीं करेंगे। इसमें 1 सीट कांग्रेसी विधायक डा जावेद के किशनगंज से सांसद बनने से खाली हुई थी। दूसरी लोकसभा सीट समस्तीपुर पर कांग्रेस गठबंधन में चुनाव लड़ी थी जिसमें अशोक राम बतौर प्रत्याशी चौथी बार रिकार्ड हार के साथ पार्टी के तिरंगे को बदनाम और बदरंग कर दिया था।

आपको बता दें कि अशोक राम ने 2015 के विधानसभा चुनाव में महागठबंधन की जुगाड़ी जीती हुई सीट पर भी अपने कारनामों से इस लोकसभा संसदीय सीट के अपनी ही काबिज विधायक सीट पर 66000 से अधिक मतों से चुनाव हारकर एक नया कीर्तिमान स्थापित किया है।  यहां से लोजपा के रामचंद्र पासवान चुनाव जीतकर लोकसभा पहुंचे थे जिनकी असामयिक मृत्यु होने से उपचुनाव हो रहे हैं। पासवान वर्सेज पासवान के नाम पर अशोक राम के अलावा पूर्व बिहार यूथ कांग्रेस अध्यक्ष नागेंद्र कुमार विकल के नाम पर कांग्रेस में चर्चा हो रही थी। सांसद की मृत्यु के बाद उपचुनाव की चर्चा के साथ विकल अपनी जाति पासवान का लाभ लेने के लिए क्षेत्र में सक्रिय थे।

लंबे समय इस बार बिहार कांग्रेस संसदीय बोर्ड के पास प्रत्याशी बदलने का दवाब था। 29 सदस्यीय समिति में 19 लोगों ने अशोक राम का सामने से विरोध किया था। महागठबंधन के खिलाफ चुनाव लड़ने की खिलाफत सदानंद सिंह ने की थी। तारिक अनवर तो चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशी के सामने हाथ उठाकर समर्थन की बात पर प्रभारी का विरोध करते हुए उठकर चल दिए थे। निखिल कुमार, रामदेव राय समेत बिहार के तमाम बड़े नेताओं ने अशोक राम का विरोध किया था और नए प्रत्याशी को टिकट देने की वकालत की थी।

पहले से तय कार्यक्रम के साथ प्रभारी शक्ति सिंह गोहिल, सह-प्रभारी वीरेंद्र सिंह राठौड़, कभी चुनाव जीत न सकने वाले पृष्ठभूमि बनाए हुए प्रदेश अध्यक्ष मदन मोहन झा और एमएलसी प्रेमचंद मिश्रा, चुनाव में पारिवारिक हार का रिकार्ड दर्ज कराने वाले सांसद अखिलेश सिंह, दलित नाबालिग के बलात्कार के मामले में मुख्य अभियुक्त ब्रजेश पांडे और पार्टी तोड़ो अभियान के मुखिया रहे अवधेश सिंह, टिकट मांगने वाले ये दोनों महानुभावों अशोक राम और जावेद को छोड़कर सभी ने गठबंधन से परहेज करने की बात की। मगर इन सभी चापलूस नेताओं ने अपने-अपने व्यक्तिगत हितों के साथ बिहार कांग्रेस का सौदा कर लिया।

बिहार कांग्रेस में 19 पर ये 9 रत्न भारी पड़े। इन 9 रत्नों में किसी की हैसियत अपने बूते चुनाव जीतने की अब नहीं है। टिकट की घोषणा तो हो गई, नतीजे भी अक्तूबर में आएंगे। ये नतीजे इन घपले छाप कांग्रेसी नौ रत्नों को बेनकाब कर देंगे। पिछले ही सप्ताह जिलाध्यक्षों की मीटिंग पूरी तरह से गठबंधन के विरोध में थी। दो जिलाध्यक्षों की स्वीकृति थी, जिनमें दिल्ली वाले प्रवासी पक्षी, लखीसराय कांग्रेस आफिस में ताला लगाकर आफिस चलाने वाले प्रभात कुमार गायब थे, जबकि पटना जिलाध्यक्ष राजकुमार राजन सिर झुकाए मीटिंग में बैठे रहे। बाकी सभी जिलाध्यक्षों ने एक सुर से गठबंधन की राजनीति का विरोध किया था और बेबाकी से अपनी राय रखी थी।

आपके संज्ञान में ला दें कि केसी वेणुगोपाल के पत्र के अनुसार ये मीटिंग प्रदेश कांग्रेस के डेलीगेट्स के साथ होनी थी, लेकिन प्रदेश अध्यक्ष और प्रभारियों ने इसी मीटिंग में स्वीकार कर कार्यकर्ताओं को बरगलाने की कोशिश की और कहा कि उनके पास डेलीगेट की सूची नहीं है। सदाकत आश्रम के सूत्र बताते हैं कि प्रत्येक ब्लॉक में 3-4 डेलीगेट घूम रहे हैं। इनको चिट्ठी किसने बांटी। बिहार प्रभारी गोहिल इन उपचुनावों में फिर से एक बार राजद के साथ टैक्टिकल एलाइंस में हैं। सूत्र बताते हैं कि उन्होंने गठबंधन में दो सीटों पर कांग्रेस को समेटने के लिए बड़ी कीमत वसूल ली।

समझौते के साथ लोकसभा में 0 पर पहुंची राजद को 4 सीटों पर लड़ने का मौका देकर उसे उभरने का मौका दे दिया। यही वजह रही कि भाजपा प्रवक्ता राजीव रंजन ने चुटकी लेते हुए कहा कि बिहार के उपचुनाव को लेकर कांग्रेस-राजद बिहार की जनता और नाराज कार्यकर्ताओं का ध्यान भटकाने की कोशिश है। ये जानते हैं कि चुनाव जीतने की हालत में वे हैं ही नहीं, उन्हें राजद की बैसाखी चाहिए। यही वजह है कि कांग्रेस तेजस्वी के रिमोट से चलने वाली पार्टी बनकर रह गई है।

कांग्रेसी कार्यकर्ता भी मानते हैं कि जब तक बिहार कांग्रेस दिल्ली से चलेगी, तब तक बिहार में कांग्रेस सदाकत आश्रम तक ही सिमटी रहेगी। कांग्रेस के ये बिकाऊ प्रभारी और प्रदेश के रीढ़विहीन नेता राजद के सामने नतमस्तक रहने वाले लोग हैं। प्रत्याशियों की घोषणा इसका बडा़ सबूत है। समस्तीपुर से फिर एक बार अशोक राम और किशनगंज से परिवारवाद को मजबूत करते हुए डा जावेद की मां सईदा बानो को उम्मीदवार बना दिया गया। किशनगंज लोकसभा सीट मौलाना अनवारुल हक के इंतकाल के बाद खाली हुई थी। इस परिवार का जिले के एक समुदाय में खासा असर है।

पार्टी ने विधायक डॉ. जावेद को लड़ाकर ये लोकसभा सीट तो निकाल ली, लेकिन जावेद महागठबंधन में भी मामूली वोटों से ही ये विधानसभा सीट जीत पाए थे। मौलाना के परिवार का विधानसभा पर इस बार मजबूत दावा था। प्रभारी ने किस मजबूरी और क्या जरूरी के साथ उनको चुनावी मैदान से बाहर किया, इसका जवाब वो खुद देंगे। किशनगंज के सियासतबाज इसे कांग्रेस की भारी भूल बता रहे हैं। आसान नहीं होगा, इस सीट पर कांग्रेस की वापसी। ऐसे में कांग्रेस दोनों सीटों से खाली हाथ लौटने जा रही है।

बिहार एक लंबे समय से प्रभारी की चंगुल में उलझा रहा है। प्रभारी ही बिहार कांग्रेस को चलाते आ रहे हैं। ये सिलसिला दिग्विजय सिंह से शुरू हुआ। फिर जगदीश टाइटलर, सीपी जोशी से होते हुए गोहिल तक आ पहुंचा। टाइटलर बतौर प्रभारी के तौर पर अपने कार्यकर्ता अनिल शर्मा को 2008 में प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष बनवाने में कामयाब रहे। अनिल शर्मा के पास जीत के नाम पर पटना यूनिवर्सिटी का एक चुनाव था। इसके बाद वे कभी चुनाव में अपनी जमानत बचाने के लिए जरूरी वोटों का भी तीसरा हिस्सा जुटा नहीं पाए।

यही कमजोरी टाइटलर को बिहार कांग्रेस पर हावी करने के लिए काफी थी। उनके बाद बाद 2010 में चौधरी महबूब अली कैसर प्रदेश अध्यक्ष बने। 2013 में पद पर रहते ही पार्टी छोड़ दी। अशोक चौधरी ने भी कैसर की पुनर्रावृति की। वे भी एमएलसी बनकर अध्यक्ष से हटते ही नीतीश सरकार में सरकारी हो गए। कौकब कादरी 27 सितंबर, 2017 से 17 सितंबर, 2018 तक कार्यकारी प्रदेश अध्यक्ष के रूप में रहे। अपने कार्यकाल में उन्होंने भी उपनचुनाव भभुआ सीट पर लड़वाया। इस सीट पर उम्मीदवार शंभु पटेल के नाम के साथ तय हो गया कि कांग्रेस हारने के लिए चुनाव लड़ रही थी, नतीजा आपके सामने आया।

इसके बाद डॉ. मदन मोहन झा को 17 सितंबर 2018 में प्रदेश अध्यक्ष बनकर उतर गए। ये महानुभाव कादरी की तरह ही प्रभारी की खड़ाऊं लेकर सदाकत में डटे हुए हैं। प्रभारी की मंशा को भांपते हुए उन्होंने अपने कार्यकाल को लंबा करने का निर्णय लिया हुआ है। तभी तो प्रदेश कांग्रेस के कार्यालय में छुटभैये पार्टी के नेता के तौर कदमताल करते हुए देखे गए। इनका भी कार्यकाल बिना किसी जीत के बीतता जा रहा है। ये भी प्रभारी के साथ-साथ उस चौकड़ी का हिस्सा बने हुए हैं जहां ”हम नहीं सुधरेंगे” का बोर्ड टंगा हुआ है। इन्हें दिखाई दे न दें, मगर कार्यकर्ता को जरूर ये बोर्ड टंगा दिखाई देता है।

वर्तमान में चार कार्यकारी प्रदेश अध्यक्ष, 21 कार्य समिति सदस्य और 19 सलाहकार समिति सदस्य हैं। इसमें से दो कार्यकारी कौकब और समीर एमएलसी बनने को बेताब हैं। अशोक राम तो लोकसभा में राष्ट्रीय स्तर पर पांचवीं बार हार की कालिख पुतवाने को तैयार बैठे हैं। कांग्रेस की बिहार इकाई के अध्यक्ष मदनमोहन झा, प्रदेश प्रभारी शक्ति सिंह गोहिल तथा कुछ अन्य वरिष्ठ नेताओं ने अब गठबंधन के नाम पर लीपापोती शुरू कर दी है। कांग्रेस का झंडा नाथनगर, सिमरी बख्तियारपुर, दरौंदा और बेलहर विधानसभा सीट से परमानेंट उखड़ गया है।

नाथनगर सीट के लिए प्रभारी प्रवीण कुशवाहा को टिकट देने के लिए बेचैन थे। प्रवीण कुशवाहा कांग्रेस के उन चर्चित नेताओं में हैं जिनके कारनामों के चर्चा में आने के बाद बिहार कांग्रेस आज तक सड़क दबा रही है। बिहार के चर्चित सैक्स स्केंडल पापड़ी बोस कांड से जुड़े ये नेताजी गोहिल के बेहद करीबी हैं। इनके कारनामों की वजह से बिहार के चर्चित मुख्यमंत्री भागवत झा आजाद को सरकार से जाना पड़ा था जिन्होंने कापरेटिव भ्रष्टाचार माफिया के खिलाफ लंबी लड़ाई लड़ी थी। उनको हटाए जाने के मसले को उठाकर जनता दल के नेताओं ने बिहार कांग्रेस को जड़ से ही उखाड़ दिया।

वो प्रवीण कुशवाहा की सिफारिश कांग्रेस में गोहिल, मदन मोहन झा समेत पूरी चौकड़ी कर रही थी। राजद के तेजस्वी ने एक सिरे से इंकार करते हुए अपने चारों उम्मीदवारों की घोषणा कर इनकी बोलती बंद कर दी। बिहार चुनाव के टिकट की घोषणा के बाद नतीजों की घोषणा की प्रतीक्षा में हैं। कांग्रेस की ये चौकड़ी क्या गुल खिलाती है, चुनाव प्रचार होगा कि नहीं या फिर चुनावी प्रचार के लिए आया पैसा का बंदरबांट होगा, कितने वोट मिलेंगे, इसको लेकर कार्यकर्ता अपने गणित से हिसाब जोड़-घटाने में लग गए हैं।

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