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Operation Blunder, इंदिरा गाँधी, और एन. के. सिंह की कहानी

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Operation Blunder: देश को पहली गैर-कांग्रेसी सरकार मिल चुकी थी. नई नवेली जनता पार्टी की सरकार के नेतृत्व का पूरा जिम्मा अकेले मोरारजी देसाई उठा रहे थे. वही मोरारजी देसाई जो पिछली इंदिरा सरकार में उपप्रधानमंत्री के पद पर बैठे थे. लेकिन, बाद में इस पद से निष्कासित कर इमरजेंसी के दौरान जेल में डाल दिए गए थे.

लगातार दो दशकों से केवल कांग्रेस सरकार द्वारा चल रहे देश में एक गैर-कांग्रेसी नेता का प्रधानमंत्री बन जाना लोकतंत्र के लिए अच्छे दिनों की तरह था. लेकिन, इन अच्छे दिनों की उम्र ना तो लम्बी थी और ना ये तंदरुस्त थे. इस गैर-कांग्रेसी सरकार ने भी वैसी ही गलती कर डाली, जैसी इंदिरा ने इमरजेंसी के दौरान की थी. गलती अपनी पॉवर का इस्तेमाल कर अपने विरोधी को गिरफ्तार करने की. इंदिरा की गलती को नाम दिया गया था ‘इमरजेंसी’ और जनता पार्टी सरकार की इस गलती को नाम दिया गया ‘ऑपरेशन ब्लंडर’.

पहले गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई

                                                                   वो दिन, 3 अक्टूबर

उन दिनों गाँधी परिवार 12 Willingdon Crescent पर रह रहा था. बेशक इंदिरा गाँधी अब सत्ता में नहीं थी. लेकिन, घर का यह पता फिर भी इतना ताकतवर था कि देश के उस वक़्त के गृह-मंत्री चौधरी चरण सिंह को गाँधी की गिरफ्तारी के लिए कोई खास पुलिस अफसर चाहिए था. बहुत सोच-विचार के बाद सीबीआई के पुलिस सुपरिटेंडेंट एन. के. सिंह को इस काम के लिए चुना गया. उनकी छवि सरकारी महकमे में काफी सुलझी हुई मानी जाती थी |

3 अक्टूबर, 1977 को शाम पौने पांच बजे एन के सिंह अपने काफिले के साथ इंदिरा गाँधी के दरवाजे पर खड़े थे. गृह मंत्री की तरफ से सख्त ऑर्डर था कि इंदिरा को न तो हथकड़ियां पहनाईं जाएं और न ही उनके साथ बुरा व्यवहार किया जाए. एन के सिंह ने किया भी वैसा ही. मिसेस गाँधी को बड़ी इज्जत से बता दिया गया कि उनकी गिरफ्तारी का ऑर्डर आया है. उनके पास एक घंटा है तैयार होने के लिए. एक घंटे के बाद उन्हें पुलिस के साथ चलना होगा.

4 तारीख को छपा अमेरिकी अख़बार The New York Times

4 तारीख को छपा अमेरिकी अख़बार The New York Times

एक घंटा. यानि साठ मिनट. 11 वर्षों से देश चलाने का अनुभव रखने वाली इंदिरा के लिए इतना वक़्त काफी था अपना पासा फेंकने के लिए जिससे की एक नया खेल शुरू किया जा सके. एक घंटे में सब बड़े मीडिया संस्थानों तक खबर पहुँच चुकी थी. रिपोर्टर्स इंदिरा के घर के सामने सब कुछ कैमरे में कैद करने के लिए खड़े थे. कांग्रेस समर्थकों को प्रदर्शन के लिए बुला लिया गया था. इस एक घंटे में इंदिरा ने इतना इंतजाम तो कर ही लिया था कि पुलिस के काफिले के साथ-साथ वो जनता सरकार की ‘पॉपुलर इमेज’ का जनाज़ा भी लेती जाएं.

                                                                       मिसेज गाँधी की गिरफ्तारी का कारण

मिसेस गाँधी पर जनता पार्टी सरकार द्वारा यह आरोप लगाया गया कि उन्होंने अपने इलेक्शन कैंपेन के दौरान पैसों की धांधली की है. न केवल उन्होंने सरकारी पैसों का इस्तेमाल किया है. बल्कि 100 जीपें उनकी पार्टी कांग्रेस ने ऐसी भी इस्तेमाल की हैं, जो कुछ उद्योगपतियों ने सरकार से डर कर कांग्रेस को तोहफे में दी थी. मोटी भाषा में कहें तो, इंदिरा पर ‘Abuse of Power’ का आरोप था.

यह तो था सरकारी पक्ष. इससे उलट कांग्रेस पक्ष का कहना था कि इंदिरा को केवल बदला लेने के लिए गिरफ्तार किया गया है. इमरजेंसी के दौरान इंदिरा ने जिन नेताओं को गिरफ्तार करवाया था, वही नेता अब सत्ता में बैठे थे. उन पर यह आरोप लगा कि अपने अहंकार की तुष्टि के लिए, बदला लेने के लिए उन्होंने इंदिरा गाँधी को गिरफ्तार करवाया.

                                                                           नतीजा निकला ‘ऑपरेशन ब्लंडर’

इस गिरफ्तारी का नतीजा कुछ ऐसा रहा कि इस ऑपरेशन का नाम ही ‘ऑपरेशन ब्लंडर’ रख दिया गया. इंदिरा को गिरफ्तारी के अगले दिन जब मजिस्ट्रेट साहब के पास लाया गया तो मजिस्ट्रेट ने इंदिरा के खिलाफ इकट्ठा किये गए सबूत मांगे. सबूत के नाम पर पुलिस के पास कुछ नहीं था. सबूतों के अभाव के चलते इंदिरा को तुरंत रिहा कर दिया गया. 3 तारीख को गिरफ्तार हुई इंदिरा 4 तारीख तक रिहा हो चुकी थीं. और इंदिरा के साथ-साथ रिहा हो गया था वो जिन्न जो अगले चुनावों में जनता पार्टी को सताने वाला था.

इस गिरफ्तारी उर्फ़ ऑपरेशन ब्लंडर को कांग्रेस ने अच्छे से भुनाया. इमरजेंसी में आरोपी बनी इंदिरा इस गिरफ्तारी के कारण ‘विक्टिम’ की इमेज में आ चुकी थीं. जनता सरकार, जो इमरजेंसी के बाद की ‘मसीहा’ थी, अब आरोपी बन चुकी थी.

गिरफ्तारी के बाद घर वापस लौटती इंदिरा गाँधी

1980 में लोकसभा चुनाव हुए. जनता पार्टी सरकार की अन्य कमजोरियों के यज्ञ में ऑपरेशन ब्लंडर एक पूर्ण आहुति थी. चुनावी नतीजों में कांग्रेस को 353 सीटें मिलीं और इंदिरा दोबारा प्रधानमंत्री की कुर्सी पर जा बैठीं और कुर्सी पर बैठते ही उन्होंने इतिहास के उस पन्ने को पूर्ण विराम दे दिया, जिसकी शुरुआत के अक्षर ‘ऑपरेशन ब्लंडर’ थे.

अभिषेक लोहिया एक इंजीनियर टर्न्ड पत्रकार हैं, ब्लिट्ज इंडिया के संस्थापक सदस्य और SEO Head हैं | स्पोर्ट्स के अलावा अभिषेक अंतरराष्ट्रीय राजनीति और टेक्निकल पहलुओं पर लिखना पसंद करते हैं | अभिषेक काफी आरटीआई भी भरते रहते हैं और इसके साथ कई आन्दोलनों में भी सक्रिय रहे हैं | अभिषेक का ट्विटर हैंडल @ChiragLohia2 हैं|

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