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पवार का वार खाली, मोदी-शाह के साथ गडकरी का शह-मात का खेल

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नई दिल्ली। महाराष्ट्र में सरकार गठन में उत्पन्न गतिरोध को बनाए रखने में भाजपा की अंदरूनी राजनीति का बड़ा खेल खुलता दिख रहा है। भाजपा पूरी तरह से मोदी और शाह की जेबी पार्टी बनकर सरकार और संगठन दोनों पर काबिज है जिसकी कीमत अभी हालिया दो राज्यों के विधानसभा चुनावों में चुकाई है। मोदी ने अमित शाह को गृहमंत्री बनाकर मनमुताबिक एक बड़ी सियासती जीत हासिल की है। देश पर अपना पूरा नियंत्रण करने के साथ ही संगठन को भी अभी अपने हिसाब से चलाना चाहते हैं।

यही वजह है कि भाजपा संगठन में एक पद एक व्यक्ति की परंपरा को निभाने की कोशिश करने के साथ-साथ संगठन पर अपना नियंत्रण बरकरार रखने का उनका राजनीतिक कौशल कमाल का है। विश्वासपात्र जेपी नड्डा को कार्यकारी अध्यक्ष बनाकर संगठन की बागडोर अपने हाथों में आज भी रखा है। नड्डा की राजनीति पर शाह का नियंत्रण है। यही वजह है कि जेपी नड्डा भाजपा संगठन में हाथी के दांत हैं। हालिया महाराष्ट्र और हरियाणा के विधानसभा चुनावों में अपने वफादारों के टिकट मोदी और शाह ने तय किए थे। न जीतने की खुफिया रिपोर्ट के विपरीत वफादारी के नाम पर इन दोनों जोड़ी ने कई नेताओं को टिकट दिए थे।

370 का जबर्दस्त अंडरकरंट होने के बावजूद और आपसी सिर-फुटव्वल में उलझा कांग्रेसी संगठन की लड़ाई के बावजूद भाजपा 40 सीटें हरियाणा में जीतने में कामयाब नहीं। शुरूआत में 15 सीटों का आकलन करने वाली कांग्रेस भाजपा के कमजोर उम्मीदवार के मुकाबले 31 सीटों पर पहुंच गई। वहीं अपने वजूद के लिए लड़ रही जेपीपी 10 सीटों पर कामयाब हो गई। इनके बावजूद मोदी-शाह ने अपने उसी प्यादे के सिर पर दोबारा ताज रख दिया, जबकि हाईकमान पर पिछले तीन सालों से मनोहर लाल खट्टर को हटाने का दवाब था। खट्टर सरकार और संगठन दोनों को खट्टा कर चुके थे। तभी तो अनिल विज को छोड़कर सभी मंत्री अपना चुनाव हार गए।

लोकसभा में बड़ी जीत हासिल कर केंद्र में सरकार बनाकर और धारा 370 को हटाने का अतिआत्मविश्वास मोदी-शाह को टिकट वितरण में ले डूबा। महाराष्ट्र में मोदी-शाह की जोड़ी देवेंद्र फडनवीस को दोबारा मुख्यमंत्री बनाने की घोषणा के साथ चुनाव में गई और पिछड़ गई। जनता में विश्वास खो रही शिवसेना और भाजपा की युति की और बुरी गत होती, अगर कांग्रेस संगठन में टिकटों की बंदरबांट न हुई होती। भाजपा पर महाराष्ट्र में चेहरा बदलने का दवाब था, लेकिन अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चट्टान की तरह फडनवीस आज भी डटे हुए हैं। जबकि भाजपा 122 से 105 पर आ गई और शिवसेना 63 से 56 पर पहुंच गई।

गठबंधन की जीत के बाद भी सरकार न बन पाना मुख्यमंत्री देवेंद्र फडनवीस को बनाए रखने की जिद मात्र है। आपको बता दें कि फडनवीस ने शिवसेना को कमजोर रखने के लिए शरद पवार को भी घोटाले में लपेटने का मशविरा दिया था, जिससे सूबे की सियासत गर्मा गई। महाराष्ट्र में शरद पवार का अपना एक कद है और पवार ने जो धुआंधार कैंपेन किया और उनके प्रति जो सहानुभूति उपजी, उसने भाजपा को ही कमजोर कर दिया, साथ ही उसका फायदा कांग्रेस को मिला जो अपने लिए 15 सीटों की उम्मीद लगाए बैठी थी। कांग्रेसी दिग्गज अशोक चव्हान, बालासाहेब थोराट, पृथ्वीराज चव्हान, नितिन राउत अपने-अपने विधानसभा के क्षेत्रों से बाहर नहीं निकल पाए। बावजूद इसके लोकसभा में 1 पर टिकी कांग्रेस 42 से 44 तक पहुंच गई।

एनसीपी सुप्रीमो पवार के घर पर शिवसेना के दिग्गज माथा टेक रहे हैं। भाजपा-शिवसेना की फूट में शरद पवार खुद को मुख्यमंत्री बनने का सपना पाल रहे हैं। इसके पहले कांग्रेसी सरकार में घूसने के लिए बेताब दिख रहे थे। पृथ्वीराज चव्हान, अशोक चव्हान, बालासाहेब थोराट समेत सारे दिग्गज सोनिया गांधी से मिलने का वक्त मांग रहे थे ताकि शिवसेना के साथ मिलकर सरकार में घुसने की एनओसी मिल सके। ये सारे खेल दिल्ली में कांग्रेस के खजाने पर काबिज अहमद पटेल खेल रहे थे, जिसे अहमद विरोधी खेमे ने कांग्रेस अध्यक्ष को शिवसेना के साथ सरकार बनाने से राष्ट्रीय स्तर पर होने वाले नफे-नुक्सान से अवगत करा दिया।

यही वजह थी कि सोनिया गांधी ने महाराष्ट्र के उन दिग्गजों से मिलने से ही इंकार कर दिया था। अब भी एनसीपी सुप्रीमो के पीछे लटककर कांग्रेसी सरकार में घूसने का जुगाड़ बना रहे हैं लेकिन महाराष्ट्र की राजनीति को समझने वाले इसको भाजपा की बी टीम का खेल मान रहे हैं जिसकी अगुवाई आज नितिन गडकरी कर रहे हैं। गडकरी के बालासाहेब थोराट के साथ बड़े घनिष्ठ संबंध हैं और उद्धव आज भी उनको बड़े भाई का सम्मान देते हैं। जिस दिन भाजपा का राष्ट्रीय नेतृत्व गडकरी के नाम पर तैयार होगा, उसी दिन सूबे में भाजपा-शिवसेना की सरकार काबिज हो जाएगी।

सत्ता का भूखा कांग्रेसी कुनबा जैसे-तैसे सरकार बनाने की जुगाड़ में कुतर्क पेश कर रहा है। आपको बता दें कि 1975 में इंदिरा गांधी के रूतबे को सलाम करते हुए शिवसेना प्रमुख बालासाहेब ठाकरे ने खुद को बचाओ अभियान के तहत आपातकाल का सपोर्ट करके सबको चौंका दिया था जिसकी भारी कीमत शिवसेना को 1978 के विधानसभा चुनाव और बीएमसी चुनाव में चुकानी पड़ी। पार्टी में बालासाहेब के इस फैसले की इतनी आलोचना हुई थी कि उनको मुंबई की एक रैली में अपना इस्तीफा तक देना पड़ा था जिसे बाद में उन्होंने पार्टी के कुछ नेताओं के साथ समझौते के बाद वापस ले लिया।

शिवसेना भाजपा को दवाब में लेने के लिए भले माहौल बना रही हो, मगर कांग्रेस का हाथ पकड़ते ही शिवसेना फिर अपनी औकात में आ जाएगी। पिछले बीएमसी चुनाव में भाजपा ने शिवसेना को उसकी औकात बता चुकी है। अगर कांग्रेस से हाथ मिलाया तो कागज तक सिमट कर रह जाएगी। इस बात को शिवसैनिक बखूबी समझते हैं। भाजपा के दोनों खेमे एक-दूसरे को थकाकर बाजी मारने की फिराक में हैं। इतना को तय है कि भाजपा और अमित शाह किसी कीमत पर किसी दूसरी सरकार को बनने का मौका नहीं देंगे। फडनवीस के अलावा जैसे ही दूसरा चेहरा सामने आएगा, भाजपा-शिवसेना युति की सरकार बनना तय है। देखना है कि मोदी-शाह के चहेते फडनवीस और संघ के चहेत गडकरी में कौन बाजी मार ले जाता है।

रितेश सिन्हा पिछले दो दशक से पत्रकारिता जगत का जाना माना चेहरा रहे हैं | रितेश कई जन आंदोलनों में सक्रिय रहे हैं और जनता के सरोकार में निरंतर पत्रकारिता करते रहे हैं | रितेश नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित पुस्तक "हाउ बर्ड्स फ्लाई" का हिंदी अनुवाद कर चुके हैं और इसके अलावा कई अन्य प्रकाशनों की पुस्तकों का भी अनुवाद कर चुके हैं | फिलहाल रितेश ब्लिट्ज इंडिया न्यूज़ के संपादक हैं और राजनीतिक विषयों पर लिखते हैं | इनका ट्विटर हैंडल @RGOFFICE9 है |

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